किसान और व्यापारी भाइयो भारत सरकार ने करीब चार साल से चले आ रहे निर्यात प्रतिबंध को हटाकर 25 लाख टन गेहूं निर्यात की अनुमति तो दे दी है, लेकिन घरेलू बाजार में गेहूं की ऊंची कीमतों और वैश्विक बाजार में चल रहे कम दामों की वजह से इस लक्ष्य को पूरा करना काफी चुनौतीपूर्ण लग रहा है; साथ ही सरकार ने साल 2026-27 के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) भी ₹160 बढ़ाकर ₹2,585 प्रति क्विंटल तय कर दिया है, जिससे निर्यात की राह और भी कठिन हो सकती है। केंद्र सरकार ने भले ही 25 लाख टन गेहूं के निर्यात की मंजूरी दे दी हो, लेकिन घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों की मौजूदा स्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि इस पूरी मात्रा का बाहर भेजा जाना (शिपमेंट) काफ़ी मुश्किल होगा। इसके साथ ही, सरकार ने गेहूं से बने उत्पादों (वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स) का निर्यात कोटा भी 5 लाख टन से बढ़ाकर 10 लाख टन कर दिया है, जिसकी वजह से विदेश के खरीदार देशों में अब साबुत गेहूं खरीदने को लेकर दिलचस्पी कम हो सकती है।
व्यापार विश्लेषकों का मानना है कि भारत में गेहूँ की घरेलू कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के मुकाबले काफी ज़्यादा चल रही हैं, जिसकी वजह से रूस, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूक्रेन, अर्जेंटीना और फ्रांस जैसे प्रमुख निर्यातक देशों से मिल रही कड़ी चुनौती और उनकी आक्रामक व्यापार नीतियों का सामना करना भारत के लिए आसान नहीं होगा; हालांकि, इन सबके बावजूद कुछ पड़ोसी देश अपनी ज़रूरतों के लिए भारत से गेहूँ खरीदने में रुचि दिखा सकते हैं। भारतीय गेहूं की मौजूदा स्थिति को देखें तो कांडला बंदरगाह पर इसकी डिलीवरी कीमत ₹25,200 से ₹25,500 प्रति टन के आसपास बैठ रही है, जिसे डॉलर में बदलें तो यह $285-$288 प्रति टन होती है और अगर इसमें मध्य पूर्व या दक्षिण-पूर्व एशिया तक का भाड़ा भी जोड़ दिया जाए, तो कुल लागत $305-$308 प्रति टन तक पहुँच जाती है। इसके विपरीत, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में गेहूं की वैश्विक कीमत केवल $260 प्रति टन के करीब चल रही है, जिसका मतलब है कि भारतीय गेहूं दुनिया के मुकाबले कम से कम $45-$48 प्रति टन महंगा पड़ रहा है; यही वजह है कि कई बड़ी कंपनियों ने मार्च के दूसरे पखवाड़े के लिए $286-$290 प्रति टन के भाव पर अपने ऑफर दिए हैं।
मौजूदा स्थिति को देखते हुए गेहूं निर्यात का 25 लाख टन का लक्ष्य पूरा करना काफी मुश्किल लग रहा है, क्योंकि ब्लैक सी क्षेत्र का गेहूं भारतीय गेहूं (11.5% प्रोटीन) के मुकाबले लगभग $20 सस्ता पड़ रहा है। हालांकि, बिहार से सड़क या रेल मार्ग के जरिए बांग्लादेश को गेहूं भेजना एक विकल्प हो सकता है, लेकिन वहां भी भारतीय गेहूं की संभावित कीमत $283 प्रति टन बैठती है, जबकि बांग्लादेश में मौजूदा लैंडिंग भाव $270 के करीब है, जिससे वहां अधिकतम 1 लाख टन तक ही निर्यात की गुंजाइश दिखती है। कुल मिलाकर, जब तक अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी नहीं होती या सरकार कोई विशेष निर्यात प्रोत्साहन नहीं देती, तब तक भारतीय गेहूं के लिए वैश्विक बाजार में मुकाबला करना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र सरकार द्वारा साल 2025-26 के लिए गेहूँ का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ₹160 बढ़ाकर ₹2585 प्रति क्विंटल तय करने से अब किसान इससे कम दाम पर व्यापारियों को माल बेचने को तैयार नहीं होंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि व्यापारियों और निर्यातकों को गेहूँ लगभग ₹2600 की दर पर मिलेगा, और इसमें अन्य ख़ों व अपना मुनाफ़ा जोड़ने के बाद इसकी क़ीमत इतनी ज़्यादा हो जाएगी कि विदेशी देश भारतीय गेहूँ ख़रीदने में रुचि नहीं दिखाएंगे। हालांकि, जनवरी में गेहूँ का औसत मंडी भाव ₹2587 था जो फरवरी के शुरुआती दिनों में घटकर ₹2527 पर आ गया है, लेकिन निर्यात के लिहाज़ से यह भाव अब भी काफ़ी ऊँचा माना जा रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय गेहूँ की मांग कम ही रहेगी है। बाकि व्यापार अपने विवेक से करे बाकि व्यापार अपने विवेक से करे